बकरीद क्यों मनाई जाती है? जानिए कुर्बानी की अनसुनी कहानी

अस्सलामुअलैकुम दोस्तों आज की इस पोस्ट में आप जानेगें बकरीद क्या है?, बकरीद 2023 कब है?, बकरीद क्यों मनाई जाती है? और बकरीद की कहानी जिससे आपको बकरीद की पूरी दास्ताँ समझने में आसानी होगी की इसलिए इस लेख पूरा पढ़ें और अपने दोस्तों और रिश्तेदारों के साथ जरुर शेयर करने 

बकरीद मुसलमानों के प्रमुख त्योहारों में से है और कुर्बानी की प्रथा की वजह से इस त्यौहार की काफी चर्चा की जाती है। बकरीद को ईदुल अज़हा, ईद अल-अज़हा, ईद उल-अज़हा, ईद अल-अधा और ईदुज़ जुहा भी कहा जाता है। इस्लाम में इस दिन कुर्बानी देने की प्रथा है।

बकरीद क्या है?

बकरीद जिसे बड़ी ईद के नाम से भी जाना जाता है। मुस्लिम समुदाय द्वारा विश्व भर में कुर्बानी के इस पर्व को मनाया जाता है। ईद-उल-अज़हा (बकरीद) (अरबी में عید الاضحیٰ जिसका मतलब क़ुरबानी की ईद) इस्लाम धर्म में विश्वास करने वाले लोगों का एक बहुत ही प्रमुख त्यौहार है।

इस दिन मस्जिदों में भारी संख्या में मुस्लिम लोग सफेद कुर्ते में ईद की नमाज अदा करने का यह दृश्य शानदार होता है। नमाज अदा करने के बाद अपने प्यारे जानवरों जैसे: ऊंट, बकरे, भैंस, भेड़ की कुर्बानी दी जाती है।

2023 में बकरीद कब है?

इस्लामिक कैलेंडर के अनुसार प्रति वर्ष रमजान के पवित्र महीने के खत्म होने के लगभग 70 दिन बाद जु-अल-हज्जा महीने के दसवें दिन मनाये जाने वाले बकरीद का इस्लाम धर्म में विशेष महत्व है।

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इस वर्ष, बकरीद, जिसे ईद उल-अधा के नाम से भी जाना जाता है, बुधवार, 28 जून 2023 की शाम से शुरू होकर गुरुवार, 29 जून 2023 की शाम तक रहने की उम्मीद है।

भारत में बकरीद 2023 नमाज का समय

भारत में ईद-उल-अधा या बकरीद पर विशेष प्रार्थना या नमाज के समय का खुलासा नहीं किया गया है। 

बकरीद क्यों मनाते हैं?

बकरीद के पर्व पर कुर्बानी देने की यह परंपरा इस्लाम धर्म में काफी पुरानी है! आइये हज़ारो वर्षों से चली आ रही उस परम्परा के पीछे की वजह को जानते हैं। बकरीद क्यों मनाते है?

बकरीद का त्यौहार पैगंबर हजरत इब्राहिम Ibrahim (Abraham) द्वारा शुरु हुआ था। इन्हें अल्लाह का पैगंबर (messenger of God in Islam) माना जाता है। 

एक बार हज़रत इब्राहिम अपने पुत्र हज़रत इस्माइल को खुदा के हुक्म पर खुदा कि कुर्बान करने जा रहे थे, तो अल्लाह ने उसके पुत्र को जीवनदान दे दिया जिसकी याद में यह पर्व मनाया जाता है। 

इसकी पूरी कहानी आप नीचे लेख में पढ़ सकते है-

बकरीद की पूरी कहानी

एक बार की बात है जब हजरत इब्राहिम पूरा नाम (हजरत इब्राहिम अलैय सलाम) कोई भी संतान न होने की वजह से बेहद दुखी थे। आखिरकार कई मिन्नतों के बाद अल्लाह की दुआ से उन्हें संतान के रूप में पुत्र की प्राप्ति हुई।

उन्होंने अपने इस बेटे का नाम इस्माइल रखा। हजरत इब्राहिम अपनी इस इकलौती सन्तान से बेहद प्रेम करते थे। और एक दिन अल्लाह ने हजरत इब्राहिम के सपने में आकर उनसे उनकी प्रिय चीज की कुर्बानी देने को कहा।

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अब चूंकि पूरे विश्व में हजरत इब्राहिम को सबसे अधिक लगाव, प्रेम अपने पुत्र से ही था। उन्होंने निश्चय किया कि वह अल्लाह के लिए अपने पुत्र की कुर्बानी देने को तैयार होंगे। अतः जब हजरत इब्राहिम अपने पुत्र की कुर्बानी देने के लिए तैयार हो गए। अतः जब हजरत इब्राहिम पुत्र की कुर्बानी देने जा रहे थे तो उन्हें रास्ते में एक शैतान मिला। जो उन्हें रोकने की कोशिश करता है परंतु हजरत इब्राहिम उस शैतान का सामना करते हुए आगे बढ़ जाते हैं।

जब कुर्बानी का समय आया तो उन्होंने अपनी आंखों में पट्टी बांध ली। ताकि पुत्र की मृत्यु को अपनी आंखों से ना देख सके।

तो जैसे ही हजरत इब्राहिम अपने पुत्र के गले पर छूरी (चाकू) चलाने लगे और उन्होंने अल्लाह का नाम लिया, इसी दौरान एक फरिश्ते ने आकर छूरी के सामने इस्माइल को हटा दिया और उसके स्थान पर बकरे की गर्दन को लगा दिया। जिससे बकरे का सर धड़ से अलग हो गया और इस तरह इस्माइल की जान बच गई।

कहा जाता है कि अल्लाह द्वारा हजरत इब्राहिम की परीक्षा लेने के लिए उन्होंने ऐसा किया! परंतु इस परीक्षा में हजरत इब्राहिम सफल हो गए। और तभी से कुर्बानी के लिए चौपाया जानवरों की कुर्बानी दी जाती है।

बकरी ईद कैसे मनाई जाती है?

बकरीद के इस पर्व पर खुदा की इबादत के बाद चौपाया जानवरों की बलि दी जाती है। जानवरों की बलि के बाद उस गोश्त के तीन हिस्से किए जाते हैं जिसमें से पहला हिस्सा गरीबों को दे दिया जाता है, जबकि दूसरा हिस्सा अपने रिश्तेदारों एवं करीबी दोस्तों लोगों के बीच वितरित किया जाता है जबकि गोश्त का आखिरी हिस्सा अपने लिए रखा जाता है।

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इस्लाम धर्म में मान्यता है कि बकरीद में कुर्बानी के लिए उन जानवरों को चुना जाता है, जिनकी सेहत तंदुरुस्त होती है अर्थात जो पूरी तरह स्वस्थ होते हैं। क्योंकि कुर्बानी के लिए किसी बीमार जानवर का इस्तेमाल करने से अल्लाह राजी नहीं होती। मान्यताओं के मुताबिक उस प्रत्येक मुसलमान के लिए कुर्बानी देना अनिवार्य है, जिसकी हैसियत होती है।

बकरीद में कुर्बानी के नियम 

  • इस्लामिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन जानवरों की कुर्बानी अल्लाह की रजा के लिए करते हैं,
  • बकरीद के दिन बकरा, भेड़, ऊंट जैसे किसी जानवर की कुर्बानी दे सकते है हैं।
  • बकरीद में कुर्बान किया जाने वाले जानवर पूरी तरह से स्वास्थ्य होने चाहिए और उनसे आपका लगाव होना जरुरी है
  • बकरीद का त्यौहार में अपने प्यारी चीज़ की कुर्बानी दी जाती है कुर्बानी दिए जाने वाले जानवरों को अपने घरों में पालते है
  • बकरीद के दिन कुर्बानी के गोश्त को तीन हिस्सों में बांटा जाता है। एक खुद के लिए, दूसरा सगे-संबंधियों के लिए और तीसरा गरीबों के लिए जिससे उनकी मदद की जा सके और जो कुर्बानी नही कर सकते उनके घरों में गोश्त पहुच सके।

बकरीद से सम्बंधित FAQs

Q.01 बकरीद में क़ुर्बानी का महत्त्व क्यूँ ज़्यादा होता है?

Ans. क़ुर्बानी का महत्त्व यह है कि इन्सान ईश्वर या अल्लाह से असीम लगाव व प्रेम का इज़हार करे और उसके प्रेम को दुनिया की वस्तु या इन्सान से ऊपर रखे। इसके लिए वह अपनी प्रिय से प्रिय वस्तु को क़ुर्बान करने की भावना रखे।

Q.02 क्या बकरीद के दिन ही बकरे को खरीद लाएं और कुर्बानी दे सकते हैं?

Ans. बिल्कुल नही कुरआन के अनुसार ऐसा नही कर सकते की बकरीद के दिन ही बकरे को खरीद लाएं और कुर्बानी दे दें।

Q.03 बकरीद का दिन कैसा दिन होता है?

Ans. बकरीद का दिन, फर्ज-ए-कुर्बान का दिन होता है।

Q.04 बकरीद का अन्य नाम क्या है?

Ans. बकरीद का अन्य नाम हैं: ईद-उल-अज़हा, ईद उल ज़ुहा, कुर्बानी

आज आपने क्या सीखा

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